September 18, 2018

मालती साहू जैसे साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोगों को आत्म-निर्भर बनाया है कुटीर उद्योग ने

24 साल की मालती साहू राजनांदगांव जिले के सुकुलदैहान गाँव की रहने वाली हैं। उनके पति गाड़ी चलाते हैं, यानी ड्राईवर हैं। पति को बमुश्किल महीने छह हजार रुपये मिल पाते हैं। घर में सास हैं और देवर भी। छह हजार रुपये में घर-परिवार चलाना आसान नहीं है। मूलभूत जरूरतों को पूरा करने के लिए घरवालों को मजदूरी भी करनी पड़ती थी। लेकिन जैसे ही जिला प्रशासन ने गाँव की महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के मकसद से हाथकरघा लगवाये तब से मालती साहू को बहुत राहत मिली। वे भी अब दूसरी महिलाओं की तरह गाँव में जिला प्रशासन और बुनकर सहकारिता समिति द्वारा लगाये गये हाथकरघा पर काम करती हैं और कपड़ा बुनती हैं। सरकार उन्हें धागा देती है और इसी धागे से मालती को कपड़ा बुनना होता है। सरकार ख़ुद यह कपड़ा ख़रीद लेती है। मालती इन दिनों हाथकरघा पर कपड़ा बुनते हुए हर महीने आठ हजार से 10 हजार रुपये कमा रही हैं। इससे उनके घर-परिवार की आर्थिक स्थिति काफ़ी बेहतर हुई है।

मालती साहू जैसी कई महिलाओं को छत्तीसगढ़ सरकार की नयी हाथकरघा नीति से फ़ायदा हुआ है और उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति काफी मजबूत हुई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि छत्तीसगढ़ में ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों और लघु व्यवसायों के जरिए साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग जीवन-यापन कर रहें है। इनमें हाथकरघा बुनकर, गणवेश सिलाई में संलग्न महिलाएं, कोसा उत्पादक किसान, कुम्हार और हस्तशिल्पी शामिल हैं। छत्तीसगढ़ सरकार के ग्रामोद्योग विभाग द्वारा बुनकरों की आर्थिक स्थिति सुधारने और उन्हें लगातार रोजगार उपलब्ध कराने के लिए अनेक योजनाएं चलायी जा रही है। इसके तहत प्रशिक्षण, कौशल उन्नयन, सहायता अनुदान, कम ब्याज दर पर ऋण, धागा आपूर्ति, कपड़ा रंगाई के लिए कर्मशाला अनुदान और बेहतर पारिश्रमिक दिया जा रहा है। राज्य में 230 हाथकरघा बुनकर सहकारी समितियां है, इनमें 51 हजार से ज्यादा बुनकरों द्वारा विभिन्न तरह के कपड़े तैयार किये जा रहे हैं। बुनकरों द्वारा तैयार कपड़ों को शासकीय वस्त्र आपूर्ति योजना के तहत विभिन्न विभागों द्वारा खरीदा जाता है। इसके अलावा बुनकरों द्वारा विभिन्न अवसरों पर आयोजित हाथकरघा वस्त्र प्रदर्शनियों में विक्रय किया जाता है। बुनकरों द्वारा स्कूली बच्चों के लिए गणवेश कपड़े भी तैयार किए जाते है, जिन्हें महिला स्वसहायता समूह की महिलाओं से सिलवाकर स्कूल शिक्षा विभाग में आपूर्ति किया जाता है। वित्तीय वर्ष 2016-17 में 660 महिला स्वसहायता समूहों की लगभग छह हजार महिलाओं द्वारा 47 लाख गणवेश सेट तैयार किया गया। इसके लिए उन्हें 16 करोड़ 33 लाख रूपये का सिलाई पारिश्रमिक दिया गया। ग्रामोद्योग विभाग से सम्बद्ध विभिन्न घटकों-हाथकरघा, रेशम, हस्तशिल्प, माटीकला और खादी-ग्रामोद्योग बोर्ड की विभिन्न योजनाओं के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है।

राजनांदगांव जिले के छुरिया विकासखण्ड में आमगांव में चार करोड़ पांच लाख रूपए की लागत से कंबल प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना की गई है। इससे कंबल बुनकरों को रोजगार मिल रहा है। बुनकरों द्वारा ढ़ाई लाख नग कंबल प्रोसेस कर विभिन्न विभागों में आपूर्ति की गई है। इसके पहले प्रोसेसिंग के लिए पानीपथ (हरियाणा) भेजना पड़ता था। भारत सरकार वस्त्र मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हाथकरघा विकास कार्यक्रम के तहत राज्य के नौ विकासखण्डों-डभरा,बम्हनीडीह, नवागढ़ एवं बलौदा जिला जांजगीर-चांपा, छुरिया जिला राजनांदगांव, बालोद जिला बालोद, करतला जिला कोरबा, कुरूद जिला धमतरी और बिलाईगढ़ जिला बलौदाबाजार में हाथकरघा कलस्टर संचालित है। इन कलस्टर के जरिए उत्कृष्ट डिजाइनरों द्वारा एक हजार 620 बुनकरों को बुनाई, रंगाई और डिजाईन का प्रषिक्षण दिया जा रहा है। बुनाई कला को प्रोत्साहित करने के लिए हर साल सर्वश्रेष्ठ दो बुनकरों को एक-एक लाख रूपए का बिसाहूदास महंत पुरस्कार और दो बुनकारों को दीनदयाल हाथकरघा पुरस्कार दिया जाता है। इसी तरह हर साल सर्वश्रेष्ठ आठ हस्तशिल्पयों को पच्चीस हजार रूपए के मान से पुरस्कार दिया जाता है। इसके अलावा बुनकरों के प्रतिभावन बच्चों को शिक्षा प्रोत्साहन पुरस्कार दिया जाता है। पिछले पांच साल में तीन हजार 383बच्चों को पुरस्कृत किया जा चुका है।


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