October 29, 2018

'कड़कनाथ' बना तगड़ी कमाई का जरिया

आदिवासी बाहुल्य कांकेर जिले के किसानों को खेती के साथ दूसरे आय उपार्जन की गतिविधियों से जोड़ने प्रभावी पहल शुरू कर दी गई है। विभिन्न शासकीय योजनाओं के माध्यम से किसानों को लाभान्वित करने का प्रयास वर्षों से चल रहा है। अब इस प्रयास में कृषि विज्ञान केंद्र भी सहभागी बन चुका है। कांकेर में किसानों की समृद्घि के लिए अभिनव पहल की शुरूआत की गई है। इसके तहत् चयनित किसानों को कड़कनाथ प्रजाति के चूजों का वितरण किया जा रहा है। कड़कनाथ के मांस की बाजार में जबरदस्त मांग है और इसका दाम साधारण मुर्गे-मुर्गियों से दुगुना है।


कांकेर जिले में किसानों की उन्नति के लिए कृषि विज्ञान केंद्र लगातार प्रयास कर रहा है। कम लागत पर उन्नत तरीके से वैज्ञानिक खेती कर ज्यादा उत्पादन के गुर सिखाए जा रहे हैं। वैज्ञानिक खेती से कांकेर के सैकड़ों किसानों की समृद्धि व खुशहाली किसी से छिपी नहीं है परंतु कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के साथ दूसरी आय उपार्जन सहायक गतिविधियों से जोड़ा जाना ज्यादा फायदेमंद हो रहा है, क्योंकि जमीन सीमित हैं और बंटवारा होता जा रहा है और उसी जमीन से किसान परिवारों को समृद्धि की राह पकड़नी है। इसके लिए कांकेर में कृषि विज्ञान केन्द्र के माध्यम से मदर यूनिट स्थापित की गई है, प्रदेश के दूसरे कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से बहुतायत में अंडों से चूजे प्राप्त कर इसका वितरण कराने का कार्य शुरू कर दिया गया है। कड़कनाथ एक पक्षी वर्गीय प्रजाति है जिसके अंडे व मांस की बाजार में अधिक मांग है। कृषि विज्ञान केंद्र कांकेर द्वारा प्रथम चरण में एक सौ किसानों को चूजे वितरण का लक्ष्य रखा गया है। ये किसान चूजों का पालन कर इनसे दूसरे किसानों को भी वितरित किया जाएगा जिससे दूसरे किसान भी बाजार में अंडे व मांस बिक्री कर भरपूर लाभ कमा सकेंगे।


कड़कनाथ पक्षी प्रजाति का प्राणी है। यह पूरी तरह से साधारण मुर्गे-मुर्गियों की तरह ही होता है लेकिन इसकी विशेषता है कि यह पूरी तरह से काला होता है,यहां तक की इसका खून भी काला होता है। जहां साधारण मुर्गा का मांस 100 से 200 रूपए प्रति किलो बिकता है वहीं कड़कनाथ की आपूर्ति कम होने से इसका मांस 500 से 600 रूपए प्रति किलो ग्राम तक बिकता है। कड़कनाथ की लोकप्रियता से इसका मांस सेवन करने वालों की संख्या भी बड गई है।

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