October 29, 2018

सौ गायों की डेयरी और सवा चार हेक्टेयर में चारा व सब्जी उगाकर 12 लाख सालाना कमा रहे भाटापारा के पारस

बलौदाबाजार-भाटापारा के कृषक डेयरी उद्याेग से खासी कमाई कर रहे हैं और बड़ी तेजी से इसे अपना रहे हैं। तरक्की देखनी है तो मिलिए अचानकपुर धुर्राबांधा निवासी 52 वर्षीय पारस देवांगन से। जो पहले सवा चार हेक्टेयर में पारंपरिक खेती और सब्जी उत्पादन कर तीन मात्र तीन लाख रुपए सालाना कमाते थे। तब उनके पास उन्नत किस्म की सिर्फ दो गायें थीं। आज 100 गायों, 17 कलोर और 31 वत्स के साथ वे डेयरी उद्योग में अच्छी खासी दखल रख रहे हैं। उनकी सालाना इनकम 12 लाख रुपए है।

पारस बताते हैं कि फिलहाल उनके पास संकर नस्ल की 75 दुघारु गायें हैं। इसी तरह 25 गाभिन शुष्क गाय, 17 कलोर और 31 वत्स उपलब्ध हैं, जिससे प्रतिदिन कुल 600 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। इसे 35 रुपए प्रतिलीटर की दर से बेचा जा रहा है। इससे पहले की तुलना में उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है। वे बताते हैं कि पिछले 20 साल से खेती एवं सब्जी उत्पादन करने के बाद औसत आय हो रही थी। इतनी मशक्कत के बाद होने वाली आय से वे संतुष्ट नहीं थी। तब उनके पास उन्नत नस्ल की दो गायें थीं, जिनसे लगभग 20 लीटर दूध प्रतिदिन प्राप्त होता था और इससे 30 हजार रुपए सालाना इनकम भी होती थी।

डेयरी के इस व्यवसाय में पारस नए नहीं है। तीस साल पहले भाटापारा स्थित पैतृक जमीन पर वे डेयरी का काम ही किया करते थे, लेकिन शहर में मजदूर की समस्या होने के कारण डेयरी का व्यवसाय पूर्ण रूप से बंद कर दिया। इसके बाद फिर से रुचि जागी तो आठ वर्ष पहले अचानकपुर में ही अपनी निजी जमीन पर उन्नत डेयरी शुरू की। इसके लिए पशु पालन विभाग से मार्गदर्शन लिया। धीरे-धीरे उन्नत किस्म की गायें खरीदीं। पहले से उपलब्ध गायों में कृत्रिम तरीके से गर्भाधान द्वारा नस्ल सुधार का कार्य किया।

दुग्ध उत्पादन के लागत में कमी करने के लिए पर्याप्त मात्रा में हरा चारा उगाया और पशुओं को संतुलित आहार दिए। उन्हें 2012 में विभाग द्वारा आयोजित कृषक कौशल विकास अंतर्गत गुजरात में डेयरी का शैक्षणिक भ्रमण कराया गाय,जिससे उन्नत पशु पालन की समसामयिक जानकारी प्राप्त हुई। इसका उपयोग कर डेयरी व्यवसाय को निरंतर आगे बढ़ाया। आज वे खुद तो आगे बढ़ ही रहे हैं, गांव के कुछ युवाओं को राेजगार भी दे रहे हैं। इस व्यवसाय से उनकी आय बढ़ी है।

डेयरी व्यवसाय से होने वाली आय को वे उद्यानिकी में उपयोग कर रहे हैं। अब उन्होंने उद्यानिकी को सहयोगी व्यवसाय के रूप में विकसित कर लिया है। शक्ति चलित चाफ कटर एवं दूध निकालने के लिए मिल्किंग मशीन का भी वे उपयोग कर रहे हैं। पारस अपनी सफलता का श्रेय पशुधन विकास विभाग को देते हैं। उनका कहना हे कि विभाग ने समय-समय पर उनकी मदद की और मार्गदर्शन भी दिया। अब वे डेयरी व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए प्रयासरत रहेंगे। साथ ही इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को भी समय-समय पर सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक जानकारी देते रहेंगे।


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