September 19, 2018

सांपों से खेलने वाले संवरा के बच्चे अब स्कूल जाकर कर रहे पढ़ाई

सांपों को पकड़कर पिटारे में बंद करना और शहर व गांवों में ले जाकर उन्हें दिखाना। यही पेशा है संवरा जनजाति का। खानाबदोश जीवन जीने वाले इस समाज के बच्चों का भविष्य भी सांपों के बीच कटता है। सरकार ने इनका भविष्य सुधारने की पहल की और बिलासपुर जिले के करगीकला गांव के पास इनकी बस्ती बसा दी।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 29 परिवारों को घर दिया। मनरेगा के काम दिए ताकि उन्हें रोजगार मिल सके। बच्चों का दाखिला पास के ही सरकारी स्कूलों में कराया। कल तक सांपों से खेलने वाले बच्चे अब स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं। उन्हें मुफ्त यूनिफार्म के साथ कापी-किताबें भी मुहैया कराई गईं हैं।  जानिए गांव में रहने वाले घोरन सिंह के बारे में, जिनकी 11 साल की बेटी पूर्णिमा को सीधे पांचवीं कक्षा में एडमिशन दिया गया है। अक्षर ज्ञान देने और पिछली कक्षाओं के कोर्स पूरा कराने के लिए शिक्षक अतिरिक्त ध्यान दे रहे हैं। उसकी मां कुटेलहिन बाई कहती है कि वह रोज स्कूल जाती है। घर में आठ संतानें हैं। पांच लड़कियां और तीन लड़के। पूर्णिमा तीसरे नंबर की है। संवरा जनजाति के बाकि परिवारों की तरह ये भी सांपों को पकड़ने में माहिर हैं। बच्चे के बचपन का खिलौना भी सांप है। फिर चाहे वह पिटारे में बंद हो या खुला घूमे। उन्हें पकड़ने में इन्हें बड़ा मजा आता है, लेकिन जब से सरकार ने सिर पर छत दी।

रोजगार दिए। इस परिवार ने सांपों को पकड़ना छोड़ दिया। अब वे सामान्य ग्रामीणों की तरह ही जी रहे हैं। चांदनी भी स्कूल जाकर खुश है। उसकी मां रेखा बाई नन्हीं सी बेटी को चूल्हा-चौके की सीख दिया करती थी। अाज उसे पढ़ाने के लिए संकल्पित है। रोज उसे तैयार करती है। स्कूल जाने के लिए प्रेरित करती है। पिता स्वारथ ने भी मजदूरी शुरू कर दी है। चार पैसे कमाता है तो दो बचाता भी है ताकि भविष्य में काम आ सके। छह संतानों में पांच लड़कियां और एक लड़का है। सभी स्कूल जाने लगे हैं। स्वारथ का कहना है कि सांप पकड़कर दांत निकालने का हुनर तोे सभी जानते हैं, लेकिन केवल इतने से काम नहीं चलता था। शहर व गांव में जाकर पैसे इकट्‌ठा करना बड़ा टेढ़ा काम है। कभी लोग चावल देकर लौटा देते हैं। हमेशा सौ-डेढ़ सौ मिले कोई जरूरी नहीं। ऐसे में कभी बिना तरकारी के भी खाना पड़ता है। स्वारथ और घोरन सिंह का कहना है कि खानाबदोश जीवन में काफी दुख झेले। अब रहने को मकान है और हाथ में काम है। बाहर जाकर कमाने की झंझट ही नहीं। बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला दिला दिया है। वे कखग सीख रहे हैं। किताबें पढ़ने लगे हैं। उनका भविष्य सुधर रहा है। संवरा जनजाति के लिए यह इंतजाम करके सरकार ने बड़े पुण्य का काम किया है। समाज में इसी बात को लेकर चर्चा रहती है और सभी ने सांप पकड़ने जैसे गैर कानूनी काम छोड़ दिए हैं। अब पढ़ाई में उनकी रुचि बढ़ने लगी है। उन्हें देखकर आस-पड़ोस के बच्चें भी पढ़ाई को लेकर उत्सुक हैं।

बताया गया कि इन परिवारों की यह पहली पीढ़ी है जो पढ़ने के लिए स्कूल जा रही। इससे पहले किसी ने शिक्षा नहीं पाई। वे शिक्षा का महत्व नहीं जानते। पढ़ लिखकर तरक्की कैसे होती है उन्हें नहीं मालूम। घोरन सिंह का कहना है कि उनके बच्चों के रूप में पहली पीढ़ी ने हाथों में कापी-कलम थामी है। इस बस्ती का माहौल देखकर लगता है कि सरकार की इस पहल ने इनकी लाइफ स्टाइल बदल दी है। भोजन के लिए दर-दर भटकने वाले खेतों में जाकर अनाज उगा रहे हैं। सांप पकड़ने का हुनर त्याग फसल उगाने का सलीका सीख लिया है।


और स्टोरीज़ पढ़ें
से...

इससे जुड़ी स्टोरीज़

No items found.
© 2018 YourStory Media Pvt. Ltd. - All Rights Reserved
In partnership with Dept. of Public Relations, Govt. of Chhattisgarh