June 26, 2018

नारी अदालत: महिलाओं के हक के लिए लड़ रहीं आदिवासी समाज की ये महिलाएं

समाज में महिलाओं को हमेशा पुरुषों से कमतर माना जाता है। ये परंपरा या मान्यता सदियों से चली आ रही है। यही वजह है कि देश में महिलाओं पर तरह-तरह के जुल्म ढाए जाते हैं। घरेलू हिंसा से लेकर मारपीट और कई बार तो उन्हें जान से हाथ धो बैठना पड़ता है। हालांकि शहरों में महिलाओं की स्थिति सुधरी है, लेकिन गांवों में आज भी महिलाएं प्रताड़ना का शिकार होती रहती हैं। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में कुछ महिलाओं ने ऐसी हिंसा को रोकने और महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को खत्म करने के लिए 'नारी अदालत' की स्थापना की है। नारी अदालत गांव स्तर पर समस्याओं को सुलझाने का एक सशक्त माध्यम साबित हो रहा है।

भारत में 23 लाख महिलाएं ऐसी हैं जिनका परित्याग कर दिया गया और वे अपने परिवार से अलग रहती हैं। ये महिलाएं इतनी सक्षम भी नहीं होती हैं कि वे अपने हक के लिए कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा सकें। उनकी मदद के लिए देश के कई हिस्सों में कुछ अनोखी पहलें की जा रही हैं। छत्तीसगढ़ के उत्तरी बस्तर संभाग के अंतर्गत आने वाले कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर ब्लॉक में एक गांव है परवी। इस गांव में 47 घर हैं जिनमें 380 लोग रहते हैं। यहां अधिकतर परिवार खेती और मजदूरी से अपना जीवनयापन करते हैं। लेकिन हर जगह की तरह यहां भी महिलाओं की स्थिति बदतर थी। आदिवासी बहुल्य इस इलाके में महिलाओं को बाहर निकलने पर उनके पति द्वारा पिटाई की जाती थी और वे इसका विरोध भी नहीं कर पाती थीं। कुछ साल पहले यहां सरकार द्वारा बिहान योजना के तहत महिलाओं को एकजुट करने का प्रयास किया गया। उन्हें स्वयं सहायता समूह द्वारा जोड़ा गया और इस काम में एनजीओ 'प्रदान' ने भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मजदूरी पर आश्रित रहने वाली महिलाएं धीरे-धीरे अपनी आजीविका को दुरुस्त करने लगीं और उनकी आर्थिक हालत बेहतर होती गई। लेकिन एक चीज अब भी थी जो उनसे उनका हक छीन रही थी- घरेलू हिंसा। गांव की महिलाएं बताती हैं, 'हमें पैसे तो मिलने लगे, लेकिन पति द्वारा पिटाई में कोई कमी नहीं आई।' इलाके में शराब पीकर महिलाओं पर जुल्म और अत्याचार करना काफी सामान्य बात थी। इसी बीच 'प्रदान' एनजीओ के माध्यम से गांव की कुछ महिलाओं को झारखंड के कोडरमा जिले में भ्रमण के लिए ले जाया गया। वहां की महिलाएं स्वयं सहायता समूह के जरिए अपने जीवन में बदलाव ला रही थीं और सफलता के नए आयाम गढ़ रही थीं।

छत्तीसगढ़ की इन महिलाओं ने देखा कि वहां पर महिलाओं ने अपने अधिकार के लिए नारी अदालत की स्थापना की है। उनके मन में भी ख्याल आया कि हमारे यहां भी तो घर में रोज लड़ाई झगड़े होते हैं। क्यों न हम भी अपने यहां कुछ ऐसा ही करें। जब वे वापस लौट कर आईं तो उन्होंने समूह की एक बैठक रखी और वहां इस मुद्दे का जिक्र किया। गांव की सभी महिलाएं इसके लिए राजी हो गईं। उसी वक्त गांव की एक विधवा महिला पार्वती (बदला हुआ नाम) को गांव का ही एक व्यक्ति रोज परेशान करता था। वह उन पर शादी का दबाव डाल रहा था। लेकिन महिला इसके लिए राजी नहीं थी।

पार्वती का कहना था कि वह ऐसे व्यक्ति के साथ कैसे शादी कर सकती है जो पहले से ही शादीशुदा है। इसके अलावा वह व्यक्ति सिर्फ पार्वती को अपने साथ रखना चाहता था, उनके दो बच्चों को नहीं। समूह की महिलाओं को जब यह बात पता चली तो उन्होंने पार्वती की मदद करने की योजना बनाई। सबने उस व्यक्ति के घर जाकर उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह बात नहीं मान रहा था। फिर महिलाओं ने पुलिस को फोन कर दिया। पुलिस उस व्यक्ति को पकड़कर अपने साथ ले गई और वहां उसे समझाया। लेकिन वह पुलिस की बात भी नहीं मान रहा था। बाद में पुलिस ने कार्रवाई की धमकी दी तब जाकर मामला सुलझा।

पिछले चार महीने से यह नारी अदालत चल रही है और समूह की महिलाओं ने पांच बड़े मामले सुलझाए हैं। इसके अलावा महिलाएं नशा मुक्ति अभियान, महिलाओं के प्रति पुरुषों का व्यवहार बदलने के लिए रैली भी निकालती हैं। नारी अदालत की बात नहीं मानने वाले व्यक्ति पर दंड भी लगाया जाता है। एक व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ मार-पीट करता था। महिलाओं ने उसे माफी मांगने को कहा, लेकिन वह व्यक्ति माफी नहीं मांग रहा था। महिलाओं ने उसका बहिष्कार करने का फैसला किया। बाद में उसने महिलाओं से माफी मांगी। यह नारी अदालत सप्ताह में एक दिन शनिवार को लगती है, जहां सभी महिलाएं चर्चा करती हैं कि गांव के किन मुद्दों को हल करना है।

महिला स्वास्थ्य से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा मासिक धर्म का होता है। गांव के पुरुषों के बीच इस मुद्दे को लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं जो अंधविश्वास में तब्दील हो गई हैं। नारी अदालत के जरिए इन सभी समस्याओं से भी निपटा जा रहा है। गांव की महिलाएं कहती हैं कि वे पैसे कमाकर क्या करेंगी जब उन्हें उनका हक ही नहीं मिलेगा। समूह की एक महिला ने कहा कि स्त्री का दर्द केवल स्त्री ही समझ सकती है इसलिए हम सबने एकजुट होने का फैसला किया। अभी हाल ही में एक गरीब महिला को कैंसर हो गया। समूह की सारी महिलाओं ने मिलकर कुछ पैसे इकट्ठे किए और उसकी मदद की।

झारखंड के कुछ जिलों में पहले से ही नारी अदालतें चल रही हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में हाल में शुरू की गई ये अदालत अपने लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में अग्रसर हैं। समूह से महिलाओं में गजब का आत्मविश्वास आया है। प्रदान एनजीओ से जुड़कर भानुप्रतापपुर में ही काम करने वाली वर्णिका बताती हैं, 'पहले गांव के पुरुष ही हर काम के लिए बाहर जाते थे। महिलाएं कुएं के मेढक के सामान थीं। उन्हें बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। पुरुष उन पर शक करते थे। लेकिन महिलाएं अब अपने हक के प्रति संजीदा हो गई हैं और वे किसी भी तरह की प्रताड़ना नहीं सह सकतीं।' जिस समाज में सदियों से महिलाओं को उनके हक से वंचित किया गया हो वहां ऐसी छोटी-छोटी पहलें धीरे ही सही समाज में एक न एक दिन बदलाव तो जरूर लाएंगी।

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