September 11, 2018

कुपोषण के खिलाफ जंग छेड़ सुपोषण के लिए शुरु किया 'संवरता बचपन' अभियान, छह महीने में ही 9 हजार बच्चों को कुपोषण के दायरे से बाहर निकाल लाए

डोंगरगढ़, अछोली और कनेरी। राजनांदगांव जिले के ये 3 ऐसे सेक्टर हैं, जिन्होंने अपनी जिद से संवरता बचपना अभियान को अब तक सफलता दिलाई है। कुपोषण से जंग की मुहिम का असर ही है कि आंगनबाड़ी मित्र, कार्यकर्ता और सुपोषण मित्र समेत गांव-गांव के सरपंच व पूरे समाज ने एक साथ राजनांदगांव जिले में लगभग 9000 बच्चों को सुपोषित करने में सफलता हासिल की है।

संवरता बचपना अभियान के तहत कुपोषण से लड़ते हुए डोंगरगढ़ सेक्टर ने 72 फीसदी, अछोली ने 67 फीसदी और कनेरी सेक्टर ने 63 फीसदी बच्चों को सुपोषण के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया। इसी अछोली के गंगा की कहानी भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मेहनत का परिणाम है। मां तिजिया के घर में गंगा जब पैदा हुई, तो डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। बच्ची की हालत बहुत ही सीरियस थी। बच्ची इतनी कमजोर थी, कि तब यह अंदाजा लगाना असंभव था कि यह कुपोषण के खिलाफ जंग में जीत हासिल कर पाएगी या नहीं। बच्ची को अस्पताल दाखिल कराया गया। गंगा 22 दिन अस्पताल में ही रही। इसके बाद जब वह घर पहुंची, तो कार्यकर्ताओं की टीम भी उसके घर पहुंची। उसके परिवार को खानपान की समझाइश दी गई। घर में सफाई रखने कहा गया साथ ही मच्छरदानी की व्यवस्था कराई गई। बच्ची के खानपान में जो भी कमी थी, आंगनबाड़ी के जरिए उसे दूर किया गया। लगातार उनकी देखभाल का जायजा लिया गया, इस मेहनत का परिणाम हुआ कि बच्ची गंगा अब 2 माह की है और गंभीर कुपोषित से सामान्य की श्रेणी में आ चुकी है।


संवरता बचपन अभियान की शुरुआत तब हुई, जब पिछले साल वजन त्योहार मनाया गया। महिला व बाल विकास विभाग ने यह त्योहार मनाया। इस दौरान बच्चों की परिस्थिति का आंकलन हुआ। तब सामने आया कि जिले के 38 हजार बच्चे कुपोषित हैं। 0 से 5 साल के बीच के बच्चों में कुपोषण का यह आंकड़ा 31 फीसदी का था। इन परिस्थितियों को बदलने के लिए समाज को जोड़ा गया। सरपंचों को, पंचायत प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। अभियान के तहत पहले फेज में 26 हजार बच्चों को सुपोषित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया। बच्चों को सुपोषित करने के इस पुनीत अभियान में अलग-अलग लोगों व संस्थाओं ने फंड दिए। जिला प्रशासन ने भी डीएमएफ के जरिए फंड जारी किए। ताकि इनके सुपोषण के लिए इन्हें जरूरत के मुताबिक डाइट दिया जा सके। प्रतिदिन मॉनिटरिंग शुरु हुई। शुरुआती छह महीने में ही इस अभियान के बेहतर परिणाम नजर आने लगे। छह महीने में ही 9000 बच्चे सुपोषण के दायरे में आ चुके थे। सरपंचों ने इसमें बहुत मदद की, उन्होंने बच्चों को अंडे, दूध, फल उपलब्ध कराए। वे निजी तौर पर बच्चों की देखभाल का जायजा लेते रहे। आंगनबाड़ी में भोजन पकाने के लिए सिलेंडर तक उपलब्ध कराए गए। आंगनबाड़ी सहायिका, कार्यकर्ता, सुपरवाइजर, सुपोषण मित्रों ने कड़ी मेहनत की।


कुपोषण के खिलाफ इस मुहिम में शामिल आंगनबाड़ी मित्र, कार्यकर्ता व सुपोषण मित्रों का मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी सम्मान कर चुके हैं। प्रत्येक बच्चों की जांच कराई जाती है, मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना के जरिए बच्चों को विटामिन की दवा व प्रोटीन पाउडर भी उपलब्ध कराया जाता है। घर-घर जाकर बच्चों के लिए सुपोषण टोकरी भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं। मां-बाप को यह सलाह दी जा रही है, कि कैसे बच्चों के लिए प्रत्येक खाद्य पदार्थ आवश्यक है, जिससे वह मजबूत बन सके।

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