July 26, 2018

बंदूकधारी जवान दे रहे बच्चों को तालीम

नक्सल हिंसा से ग्रस्त बस्तर इलाके के कोंडागांव जिले में भी बाकी जिलों जैसी ही समस्याएं हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का संकट यहां भी है। प्रदेश की पुलिस से लेकर अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी में हिंसा को काबू में रखने की कोशिश हो रही है और इन सबके बीच ही इन इलाकों से कुछ ऐसे ख़बरें मिलती हैं जो उम्मीद के दिए को जलाये रखने का हौसला देती हैं। नक्सली हिंसा से भयभीत शिक्षक जब स्कूलों में पढ़ाने नहीं आ रहे तब इस इलाके में तैनात इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवानों ने यहाँ सैनिक के साथ शिक्षक बनने का फैसला किया और आज 88 बच्चों को हर दिन पढ़ाने का काम कर रहे हैं। सिर्फ पढ़ाई ही नहीं उन्हें एक मजबूत प्रशिक्षण भी दे रहे हैं और यह सबकुछ हो रहा है कोंडागांव जिले के हडेली गांव में।

हडेली गांव से बस्तर के दूसरे जिले नारायणपुर की सीमा भी लग जाती है और नारायणपुर घनघोर नक्सल प्रभावित जिला है जिसकी आंच इस गांव पर भी आती है। इसी गांव के पास आईटीबीपी का एक कैम्प लगा हुआ है। आईटीबीपी के जवान एंटी लैंडमाइन व्हीकल के साथ रोज़ाना जब गश्त पर निकलते थे तब उन्हें इस स्कूल में बच्चे हमेशा खेलते या मस्ती करते दिखाई देते थे। जवानों को लगा कि बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। आईटीबीपी के कमांडर ने पता लगाया तो बात सच निकली। उन्हें पता चला कि इस गांव में एक प्राथमिक और एक माध्यमिक स्कूल है और दोनों स्कूलों में एक एक शिक्षक नियुक्त भी किया गया है लेकिन ये दोनों शिक्षक नक्सली भय के चलते बच्चों को पढ़ाने नहीं आते। तब आईटीबीपी के इस दल ने इस गांव को ही गोद लेने का फैसला किया।

प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल को मिलाकर यहाँ 88 बच्चे पढ़ते हैं। जवानों ने जब स्कूल के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तब 33 बच्चे स्कूल आते थे। सबसे पहले इन बच्चों के मन से पुलिस की वर्दी और हथियारों का भय दूर करने के प्रयास किया गया। जब जवान बच्चों को क्लास में पढ़ाते हैं तो बन्दूक क्लास के बाहर रख देते हैं और स्कूल परिसर के बाहर दुसरे जवान सुरक्षा में तैनात होते हैं। ये जवान शिक्षा के मंदिर में हथियार अंदर नहीं ले जाते जिसके पीछे उनका तर्क होता है कि इससे बच्चों का डर दूर होता है और उनमें इंसानियत के भाव पैदा होते हैं। इस स्कूल के आसपास की हालत यह है कि बरसात में छोटे छोटे नाले पानी से भर जाते हैं और ग्रामीण सारी सुविधाओं से कट जाते हैं। इसके बावजूद जवान बच्चों के घर तक जाते हैं और यह पता लगाते हैं कि बच्चा आज स्कूल क्यों नहीं आया। बच्चों की तरफ इस तरह गंभीरता से ध्यान देने के कारण इन बच्चों के माता पिता भी उनकी शिक्षा के प्रति जागरूक हो गए हैं।

इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस की इस पहल का नतीजा यह निकला कि अब इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या 30 से बढकर 88 हो गई है। जवान रोहित नेगी, सुरकर सिंह, सिकंदर सिंह और जगराम यादव रोज सुबह दस बजे शाम चार बजे तक बच्चों को पढ़ाते हैं और इस दौरान पूरा स्कूल सुरक्षा के घेरे में होता है। ये जवान सिर्फ पढ़ाई ही नहीं इन बच्चो को जूडो कराटे का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं और उनको समझा भी रहे हैं ताकि नक्सली उनके बाल मन को अपने प्रभाव में ना ले पाएं।

इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के जवान बच्चों के बीमार हो जाने पर उन्हें अपने कैम्प तक ले जाते हैं वहां उनका इलाज करते हैं। इतना ही नहीं शिक्षा के साथ साथ ये जवान कोंडागांव में हॉकी और तीरंदाजी खेल का कैम्प भी लगा रहे हैं जिससे बच्चों का रुझान इन खेलों की तरफ बढ़ रहा है। जिसका नतीजा यह सामने आया कि कुछ बच्चों का राष्ट्रीय स्तर पर चयन भी हुआ।

इन बच्चों को शिक्षा देते समय आईटीबीपी के जवान इतने सतर्क रहते हैं कि उनकी आँखें जहाँ क्लास रूम के ब्लैक बोर्ड पर होती है तो कान स्कूल के बाहर नक्सली आहट के लिए चौकस रहते हैं। गांव वालों का कहना है कि अब उन्हें अपने बच्चों को स्कूल जाने के लिए बोलना नहीं पड़ता वे खुद स्कूल जाते हैं। बन्दूक थामने वाले हाथ कलम थाम कर शिक्षा का अलख जगा रहे हैं ऐसा उदहारण बहुत कम देखने को मिलता है।

-संजीव शर्मा

कोंडागांव

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