September 22, 2018

दिल्ली से दुबई तक पहुंची बिलासपुर के बाल वैज्ञानिकों की मोक्षा मशीन, प्रधानमंत्री के सामने दिया इको जिम का प्रेजेंटेशन, वर्ल्ड प्रॉपर्टी ओलंपियाड के लिए भी सिलेक्ट हुए

गवर्नमेंट मल्टीपरपस स्कूल बिलासपुर के बाल वैज्ञानिकों के आविष्कार मोक्षा ने दिल्ली से दुबई तक तहलका मचा दिया है। चिता की राख से खाद बनाने का यह आइडिया काम कर रहा है। केवल यही नहीं जिम में एक घंटा व्यायाम कर तीन किलो वाट बिजली बनाने का प्रेजेंटेशन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देख चुके हैं।

हालही में वर्ल्ड प्रॉपर्टी ओलंपियाड के लिए भारत से दो सरकारी स्कूलों को प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। दूसरा पोर्ट ब्लेयर का स्कूल है और छत्तीसगढ़ से पहुंचे हमारे बाल वैज्ञानिकों ने सस्टेनेबल एग्रीकल्चर पर मॉडल प्रदर्शित किया। सबसे पहले जानते हैं मोक्षा के बारे में। मोक्षा एक ऐसी मशीन है, जो चिता की राख को परिष्कृत कर खाद का रूप दे देती है। इसके साथ एक मोक्षा रोबोट भी है, जो नदी के पानी को साफ करता है। इससे प्रभावित बिलासपुर कलेक्टर पी दयानंद ने शहर के दो मुक्तिधामों में यह मशीन लगवाई है। इस राख का उपयोग फसलों के लिए किया जा रहा है। जून 2016 में जब राजीव गांधी शिक्षा मिशन अंतर्गत प्रोजेक्ट तैयार करने की योजना आई। तब भारत के 13000 प्रोजेक्ट्स में बिलासपुर का भी एक प्रोजक्ट शामिल था। कोलकाता में लोकल कम्युनिटी प्राॅब्लम यूजिंग साइंस एंड टेक्नालॉजी के तहत स्कूल के छात्रों ने प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया।

परिणाम स्वरूप भारत के 247 स्कूलों बिलासपुर भी शामिल हुआ। भारत में इसे 9वां स्थान मिला। इसकी ख्याति बढ़ती चली गई। इसी के चलते स्कूल में एटीएएल टिकरिंग लैब का विधिवत उदघाटन हुआ। एटीएएल इंचार्ज डॉ. धनंजय पांडेय बताते हैं कि इसी के बाद मोक्षा को रिप्रेजेंट किया गया। यह एक वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम है। दिसंबर 2017 में दिल्ली के स्टेडियम में प्रदर्शनी के दौरान विशेषज्ञों ने सराहा और मोक्षा मशीन पूरे भारत में प्रथम स्थान पर रही। एटीएएल टिकरिंग मैराथन में भी बिलासपुर ने दूसरा स्थान हासिल किया। इसके बाद पीएमओ से मैसेज मिला कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने प्रोजेक्ट का प्रेजेंटेशन देना है। हालही में सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के प्रोजेक्ट को लेकर यहां के छात्रों ने वर्ल्ड प्रॉपर्टी ओलंपियाड में प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया है। आइए उन बाल वैज्ञानिकों के बारे में जानते हैं जिन्होंने इस आविष्कार को जन्म दिया। पहले हैं अतुल अग्रवाल। दसवीं की परीक्षा 75 फीसदी अंकों के साथ पास करने वाले अतुल के सिर पर पिता का साया नहीं है। मां निजी स्कूल में आया का काम करती हैं। परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। सुबह पेपर बांटकर लौटता है। खाना बनाता है और खुद टिफिन लेकर स्कूल जाता है। गौरव महतो की कहानी भी अतुल से मिलती-जुलती है। वह सुबह सात बजे स्कूल बैग लेकर सीधे सिरगिट्‌टी के दोना-पत्तल कारखाने जाता है। उसने भी 10वीं की परीक्षा 78 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण की है।

वहीं स्वास्तिक प्रजापति के पिता गोपाल फेरी वाले हैं और वह होटल में काम करके अपना खर्च खुद उठा रहा है। इसी तरह यमन इलेक्ट्रानिक्स की दुकान में काम करता है और उसकी प्रतिभा के तो उसे शिक्षक भी कायल हैं। एटीएएल प्रोजेक्ट के तहत इन बच्चों के हुनर को नई पहचान मिली है। डॉ. धनंजय पांडेय का कहना है कि पहले इस प्रोजेक्ट को लेने में काफी हिचकिचाहट हुई थी। लगा कि समय बर्बाद होगा। रिजल्ट नहीं दे पाएंगे। मनोज राय सर और प्राचार्य डॉ. बरवाहा सर ने प्रेरित किया। इसी के चलते आज बच्चों की प्रतिभा निखरी और स्कूल को देश-विदेश में पहचान मिली।


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