July 19, 2018

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके के दो अनमोल शिक्षक: रिटायरमेंट के बाद भी गांव के बच्चों को पढ़ाना जारी

बस्तर का जिक्र आते ही हमारे जेहन में अचानक नक्सली हिंसा की तस्वीरें उभरकर सामने आने लगती हैं। पूरे देश में छत्तीसगढ़ के बस्तर को नक्सली हिंसा ने विकास की मुख्यधारा से दूर कर दिया है या यूँ कह लीजिये कि पिछड़ेपन की ओर धकेल दिया है। यहां दूर दराज के गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। शिक्षा की बात करें तो आलम यह है कि कहीं स्कूल नहीं है तो कहीं शिक्षक नहीं है लेकिन अब बस्तर की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल रही है। सुरक्षा बल एक तरफ शांति बहाल करने में जुटे हैं तो वहीं बस्तर में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सुदूर गांवों में जाकर बिना किसी आर्थिक लाभ के शिक्षा की अलख जगा रहे हैं। ऐसे लोगों की कर्तव्यपरायणता यह बता रही है कि अब यह आदिवासी क्षेत्र शिक्षा से वंचित नहीं रहेगा।

बस्तर के कोंडागांव जिले के रहने वाले दो शिक्षक टंकेश्वर पाणिग्रही और समीर बागची इस बात का उदाहरण है। टंकेश्वर और समीर शिक्षा विभाग से तो रिटायर हो गए हैं लेकिन शिक्षक की भूमिका ये दोनों अभी भी निभा रहे हैं। कोंडागांव जिले के सेवानिवृत्त शिक्षक टंकेश्वर और समीर बचपन के मित्र हैं और एक साथ दोनों प्रदेश के शिक्षा विभाग में बतौर शिक्षक भर्ती हुए। दोनों की पदस्थापना भी बस्तर में हुई। उन दिनों बस्तर में केवल दो जिले जगदलपुर और कांकेर ही हुआ करते थे। जब कोंडागांव जिले का गठन हुआ तो ये दोनों इसी जिले में पदस्थ कर दिए गए। तीन साल पहले वे रिटायर हो गए लेकिन जिले में शिक्षा की महती जरुरत और कर्तव्यबोध ने इन्हें अपने शिक्षकीय दायित्व को अनवरत निभाने की प्रेरणा दी। इन दोनों शिक्षक मित्रों ने तय किया कि वे बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला जारी रखेंगे।

पिछले तीन साल से श्री पाणिग्रही और बागची लगातार उन स्कूलों में जाते हैं जहाँ शिक्षक नहीं हैं। इनका ध्यान गणित विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषयों की तरफ ज्यादा होता है। बागची कहते हैं कोंडागांव जिले में अभी स्कूल और शिक्षकों की संख्या में संतुलन नहीं बन पाया है क्योंकि यह एक नया जिला है जिसकी वजह से कहीं स्कूल का भवन तो है लेकिन शिक्षक नहीं हैं इसीलिए हम ऐसे ही स्कूलों में जाते हैं जहाँ शिक्षक नहीं हैं और वहां बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि उनकी पढ़ाई को कोई नुकसान न हो और वे दूसरे बच्चों से पिछड़ ना जाएं।

आमतौर पर यह देखा जाता है कि लोग कुछ अच्छा करने का बीड़ा तो उठाते हैं लेकिन उसे निरंतरता प्रदान नहीं कर पाते, लेकिन पाणिग्रही और बागची के मामले में ऐसा नहीं है। मौसम गर्मी का हो या बरसात का ये दोनों शिक्षक स्कूल जाकर बच्चों को को पढ़ाने में नागा नहीं करते। श्री पाणिग्रही बताते हैं कि सेवानिवृत्ति के बाद उम्र का असर शरीर पर पड़ता है। अब पहले जैसी ऊर्जा नहीं होती फिर भी बच्चों का भविष्य हमारे लिए प्राथमिकता है। प्रतिदिन बच्चों को पढ़ाने के लिए जाने से बच्चों को भी नियमित स्कूल आने की आदत पड़ जाती है और इससे एक अनुशासन भी निर्मित होता है।

 

इन दोनों रिटायर शिक्षकों की लगन और निष्ठा के दूसरे शिक्षक भी कायल हैं। इन्हें देखकर स्कूल के अन्य शिक्षक भी कहते हैं कि शिक्षक का दायित्व क्या और कैसा होना चाहिए इन शिक्षकों से हमें सीखने को मिलता है। इनकी एक ख़ास बात यह भी है कि शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए स्थापित सरकारी और गैर सरकारी पुरस्कारों के लिए इन्होने कभी आवेदन नहीं दिया। छत्तीसगढ़ में श्रेष्ठ शैक्षणिक कार्य के लिए राजयपाल पुरस्कार स्थापित किया गया है, जिसे प्राप्त करने के लिए बाकायदा आवेदन जमा किया जाता है लेकिन इन दोनों शिक्षकों ने इस पुरस्कार पर कभी दावा पेश नहीं किया।

इसकी जो वजह पाणिग्रही बताते हैं वह बड़ी रोचक है। वे कहते हैं कि यदि पुरस्कार किसी एक को मिला तो वह हमें मंजूर नहीं होगा और पुरस्कार को लौटाना पुरस्कार की गरिमा के खिलाफ होगा इसलिए हम किसी भी पुरस्कार पर दावा प्रस्तुत नहीं करते। उनका मत बहुत स्पष्ट है कि पुरस्कार मिले तो दोनों को अन्यथा नहीं क्योंकि सेवा का यह कार्य हम दोनों बराबरी से करते है।

वैसे भी कोई भी अच्छा कार्य किसी पुरस्कार का मोहताज नहीं होता और ये दोनों शिक्षक मित्र गरीब बच्चों को शिक्षा देने का काम किसी पुरस्कार के लालच में नहीं कर रहे हैं। दूर दराज के गावों में स्थित स्कूलों तक ये अपने स्वयं के खर्च पर जाते हैं क्योंकि मकसद केवल बच्चों को शिक्षा देना है और कुछ नहीं। पाणिग्रही और बागची  केवल पढाई ही नही बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए भी बच्चों को तैयार करते है। हारमोनियम की धुन पर स्कूल में देशभक्ति के गाने गाकर बच्चों के अन्दर देशभक्ति की भावना का संचार करते हैं।

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