July 5, 2018

छत्तीसगढ़ के भंवरपुर के बुनकर बिचौलियों को किनारे कर ऑनलाइन सामान बेचने की कवायद में जुटे

एक वक्त देश में बुनकरों से लाखों परिवारों को रोजगार मिलता था। घर पर ही रहकर काम करने की सहूलियत होती थी और पैसे भी ठीक ठाक मिल जाते थे। लेकिन बदलते वक्त से तालमेल न बिठा पाने और उचित मार्गदर्शन व सहायता न मिल पाने के कारण इन बुनकरों की हालत बिगड़ती गई। अब सिर्फ चुनिंदा जगहों पर ही हथकरघा उद्योग चल रहे हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे हुए जिले महासुमंद में एक गांव है भंवरपुर। इस गांव में लगभग 200 परिवार हैं जिनकी आजीविका हथकरघे के सहारे ही चलती है। खास बात यह है कि इन बुनकरों ने अब बिचौलियों और व्यापारियों से पीछा छुड़ाकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अपने प्रॉडक्ट्स बेचने की तैयारी कर ली है। सरकार द्वारा चलाया जाने वाले रूअर्बन मिशन की टीम इसमें महत्वूपूर्ण योगदान दे रही है।

भंवरपुर गांव में यह काम पिछले 50 से भी ज्यादा सालों से हो रहा है। अधिकतर परिवार सिर्फ हथकरघा पर ही आश्रित हैं। गांव में पंचवटी हैंडलूम्स चलाने वाले प्रतीक कुमार देवांगन बताते हैं, 'पहले हम लोकल व्यापारियों के लिए काम करते थे। वे हमें धागा देते थे और मनचाही डिजाइन, पैटर्न के मुताबिक हमसे काम करवाते थे। लेकिन वे हमें सिर्फ दिन भर की मजदूरी देते थे। बाकी सारा मुनाफा वे अपने पास ही रख लेते थे।' ये मजदूरी इतनी कम होती है कि परिवार का गुजारा करना भी मुश्किल से हो पाता है। प्रतीक बताते हैं कि व्यापारी अगर हमारी बनाई हुई एक सिल्क साड़ी 4500 रुपये में बेचता है तो वह उससे 1,500 से 2,000 का फायदा कमाता है।

अगर देखा जाए तो सारी मेहनत इन हथकरघा कारीगरों की होती है। लेकिन उन्हें उनकी मेहनत के अनुपात में पैसे नहीं मिलते। इस स्थिति को बदलने और व्यापारियों के शोषण से निजात पाने के लिए प्रतीक ने फेसबुक और वॉट्सऐप पर ग्रुप बनाकर ऑनलाइन अपने प्रॉडक्ट्स बेचने शुरू किए। सोशल मीडिया पर उपस्थित लोगों से उन्हें अच्छा रिस्पॉन्स मिला। इसके बाद वे अपने प्रॉडक्ट लेकर पिछले साल दिसंबर में कोलकाता गए। वहां उनके कपड़ों को तो पसंद किया ही गया साथ ही उन्होंने 9,200 रुपये की बिक्री भी की। इसके बाद उनका उत्साह बढ़ा और उन्होंने ई-कॉमर्स साइट्स के जरिए ऑनलाइन बिजनेस करने के बारे में सोचा।

लेकिन अधिक जानकारी न होने के कारण वे खुद को असहाय महसूस कर रहे थे। उन्होंने गांव के बुनकरों के लिए काम करने वाली रूअर्बन की टीम से संपर्क साधा। टीम ने पूरी जानकारी निकालकर प्रतीक को दी और एक ऑनलाइन ई-कॉमर्स साइट ई-बे के साथ करार भी कर लिया। ईबे पर सारे प्रॉडक्ट लिस्ट कर दिए गए। टीम ने ऐमजॉन पर भी अपनी पहुंच बना ली है, लेकिन वहां अभी फाइनैंस और लॉजिस्टिक्स के कुछ मुद्दों को हल करना बाकी है, उसके बाद गांव के लोग सीधे अपने कपड़े ऑनलाइन मार्केट में बेच सकेंगे और उन्हें किसी व्यापारी या बिचौलियों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

प्रतीक ने बताया कि वॉट्सऐप और फेसबुक पर आसपास के लोगों ने ज्यादा ऑर्डर दिए हैं। यहां के प्रॉडक्ट्स की मुंबई जैसे बड़े शहरों में भी काफी डिमांड है, लेकिन कुछ वजहों से अभी वहां जाना नहीं हो पाया है। भंवरपुर के बने कपड़े छत्तीसगढ़ के ही जंजगीर चांपा, बिलासपुर, उड़ीसा और हैदराबाद में भी बिकने के लिए जाते हैं। यहां सिल्क, कॉटन, साड़ियां, स्टाल और सूट भी बनाए जाते हैं। इन उत्पादों की कीमत 1500 रुपये से शुरू होकर 35,000 रुपये तक होती है। लेकिन इन बुनकरों को तभी फायदा होगा जब उन्हें उनकी मेहनत का पूरा दाम मिलेगा।

ऑनलाइन मार्केटिंग और सेल्स से जुड़ी जानकारी लेने के लिए रायपुर की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी इन्हें ट्रेनिंग देने के लिए राजी हुई। साथ ही कलिंगा यूनिवर्सिटी और आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर ने भी इनकी दो टीमों को ऑनलाइन मार्केटिंग के गुर सिखाये। प्रतीक ने बताया कि ईबे पर कुछ प्रॉडक्ट्स जरूर बिके हैं, लेकिन फंड की कमी से यह काम तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। इसके लिए मुद्रा, एनआरएलएम और महिला और बाल विकास मंत्रालय से वित्त पोषण के लिए आवेदन किया है। आने वाले समय में पुरुषों के लिए भी कपड़े बनाने की योजना पर काम चल रहा है। अगर ऑनलाइन बिजनेस मॉडल को सफलता मिली तो इन बुनकरों की तकदीर संवरने में देर नहीं लगेगी।

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