July 19, 2018

बलराज की मेहनत ने छत्तीसगढ़ के सोनपुरी गांव की बंजर जमीन को बना दिया उपजाऊ

“जहां चाह – वहां राह” इस कहावत को सही साबित किया है मुंगेली जिले के बांकी गांव में रहने वाले युवक बलराज सिंह ने। बलराज ने अपने जुनून और सरकारी योजनाओं की मदद से कृषि क्षेत्र में ऐसे-ऐसे नवाचार किये कि वे आसपास के किसानों के लिये एक मिसाल बन गये हैं। पेशे से सरकारी शिक्षक बलराज सिंह अपने शैक्षणिक कार्य से बचे हुए समय का सदुपयोग कृषि कार्यों में करते हैं, जिसके परिणाम चौंकाने वाले हैं। आज इस पार्ट टाइम जॉब से बलराज सिंह की सालाना कमाई 10 से 15 लाख रुपये तक हो जाती है। इतना ही नहीं इनके काम में सहयोग करने वाले दर्जन भर कृषि श्रमिकों और उनके परिवार जनों को करीब-करीब साल भर रोजगार मिल जाता है, जिससे इन कृषि श्रमिक परिवारों के जीवनस्तर में भी बेहतरीन सुधार आ गया है।

वैसे तो कृषक परिवार में पैदा होने के कारण बलराज सिंह की बचपन से ही कृषि में रूचि थी और वे अपने बड़े भाई शिवप्रताप सिंह के कृषि कार्य में हमेशा हाथ बंटाते थे। उन दिनों खरीफ फसल में धान और रबी फसल में चना-गेहूं जैसी परंपरागत खेती ही की जाती थी, लेकिन सिंचाई के साधनों और दूसरी सुविधाओं की कमीं के चलते पर्याप्त उत्पादन नहीं हो पाता था। 1993 में 12 वीं की परीक्षा पास करने के बाद से उनके पिता प्रेम सिंह की इच्छा थी कि वह उच्च शिक्षा हासिल कर राज्य प्रशासनिक सेवा की तैयारी करें, लेकिन पढ़ाई-लिखाई के दौरान बलराज सिंह को ग्रामीण जनजीवन में गहरी रुचि हो गई थी और उन्होंने उसी समय ये तय कर लिया था कि गांव में ही रहकर उन्हें जीवनयापन के आधुनिक तरीके अख्तियार करना है और आधुनिक कृषि से बेहतर तरीका कोई और नहीं हो सकता। हालांकि पिताजी और परिवार के बड़े लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए बलराज ने मुंगेली में एमए तक की पढ़ाई की।

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही बलराज सिंह ने ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी से सघन संपर्क बनाना शुरु किया और सरकारी योजनाओं से मिलने वाले फायदों की लगातार जानकारी लेते रहे। बलराज ने स्कूल में पढ़ाने के बाद बचे हुए समय में अपने परिवार के कृषि कार्य में सहयोग करना जारी रखा।

परत(बंजर) जमीन को बना दिया स्वर्ग

बलराज सिंह ने बताते हैं कि पैतृक जमीन में वे कृषि नहीं कर पा रहे थे क्योंकि वहां पर निर्णय लेने का अधिकार पिता और बड़े भाईयों का था। ऐसे में अपनी पसंद के मुताबिक खेती करने के लिये उन्होंने रेगहा (किराये में खेत लेने की पद्धति) में खेती लेने की ठानी। वर्ष 2005 में उन्होंने बांकी के पड़ोस में सोनपुरी गांव में महज एक हजार रुपये प्रति एकड़ के दर से रेगहा में खेत मिला। इतने सस्ते में ये जमीन इसलिये मिली क्योंकि यहां सिंचाई के साधन का सर्वथा अभाव था और सालों से खेती नहीं होने के कारण यह जमीन बंजर जमीन की श्रेणी में आती थी। लेकिन आधुनिक खेती करने का भूत बलराज पर ऐसा सवार था कि उसने इस बंजर जमीन पर खेती को ही अपना मिशन बना लिया।

बलराज ने पहले 7 एकड़ जमीन को किराये में लेकर आधुनिक खेती की नींव रखी। उन्होंने सबसे पहले खेत का मृदा परीक्षण कराया और जमीन में एनपीपी के अनुपात को सही करने के लिये समुचित खादों का उपयोग किया। निदानाशक का प्रयोग कर खेत की गहरी जुताई कराई। राज्य शासन की योजनाओं का लाभ लेते हुए जिला एवं केन्द्रीय सहकारी बैंक से लोन लेकर एक ट्यूबवेल लगवाया। इस तरह से शुरुआती दो साल में आधारभूत संरचनाओं का निर्माण करते हुए सोयाबीन के साथ साथ धान की खेती शुरु की। इसमें होने वाली शुरुआती कमाई को खर्च किये बिना बलराज ने आधारभूत संरचनाओं के विकास पर लगातार ध्यान दिया। शुरुआती नतीजों से उत्साहित बलराज सिंह ने साल दर साल किराये की खेती का रकबा बढ़ाना शुरु किया और पिछले 13 सालों में उसकी खेती का रकबा 7 एकड़ से बढ़कर आज करीब पचास एकड़ तक पहुंच गया है।

आज बलराज के पास अपना खुद का ट्रैक्टर है और सात ट्यूबवेल हैं। कृषि में साल दर साल बढ़ रही आमदनी ने उसकी आर्थिक स्थिति को इतना मजबूत बना दिया है कि पिछले साल उन्होंने 11 लाख रुपये की एक कार भी खरीद ली है। अब बलराज इतने उत्साहित हैं कि उन्होंने पिछले दो सालों से गन्ने की खेती करना शुरु कर दी है। पहले साल प्रयोग के तौर पर उन्होंने पांच एकड़ खेत में गन्ना लगाया और इस पांच एकड़ में करीब एक लाख रुपये  प्रति एकड़ की औसत से आमदनी भी हुई। बलराज ने इस साल करीब 20 एकड़ खेत में गन्ने की खेती शुरु की है। पड़ोसी जिले में दो-दो शक्कर कारखानों की स्थापना ने बलराज को इस दिशा में प्रेरित किया और उसने गन्ने की खेती पर फोकस कर दिया है। बलराज सिंह की सफलता से प्रेरित होकर न सिर्फ बांकी गांव के युवा बल्कि पड़ोसी गांव के युवा भी कृषि की ओर आकर्षित हो रहें हैं और बलराज द्वारा की जा रही आधुनिक खेती को देखने और सीखने के लिये आने लगे हैं।

-रवि शुक्ला मुंगेली

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