October 17, 2018

10वीं में 90% के साथ मिली सफलता, अब बायो पढ़कर टीचर बनना चाह रही है दुर्गेश्वरी

ये कहानी है झलमला के शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला की कक्षा 12वीं में पढ़ने वाली दुर्गेश्वरी देवांगन की। वह गांव में रहती है और सुविधाओं से वंचित भी, लेकिन पढ़ाई में किसी से कम नहीं। तभी तो 90 फीसदी अंकों के साथ 10वीं की परीक्षा पास की और बायो विषय चुना। फिलहाल 12वीं की पढ़ाई कर रही है और बड़े होकर टीचर बनना चाहती है ताकि बाकि बच्चों को पढ़ाकर डॉक्टर-इंजीनियर बना सके।

ऐसा इसलिए कि एक टीचर ऐसे कई व्यक्तित्वों को गढ़ सकती है, जो समाज की सेवा कर सकें। दुर्गेश्वरी कहती हैं कि उन्हें यह ख्याल आया अंग्रेजी की टीचर रेखा साहू को देखकर। वह उनसे बेहद प्रभावित हैं। उनके पढ़ाने का ही नतीजा है, किताबों से प्रेम बढ़ा। आज विषय में उनकी पकड़ मजबूत हुई है और वे चाहें तो डॉक्टर बनकर समाज की सेवा कर सकती हैं, लेकिन वह डॉक्टर नहीं बनना चाहती, बल्कि टीचर बनकर एेसे कई डॉक्टर बनाना चाह रही हैं।

उन्होंने अपनी सफलता का राज भी बताया। कहा कि वह अपने शिक्षकों को बहुत ध्यान से सुनती हैं। कक्षा में जो कुछ भी पढ़ाया जाता है उस पर पूरा ध्यान देती हैं। इससे विषय को समझने में आसानी होती है और दोबारा पढ़ने पर वह अच्छे से याद हो जाता है। दुर्गेश्वरी शुरू से होशियार हैं। प्राइमरी और मिडिल स्कूल की कक्षाओं में भी उन्होंने अच्छे अंक प्राप्त किए। आठवीं पास करने के बाद उन्हें अपने गांव से दूर झलमला के हाईस्कूल में एडमिशन लेना पड़ा। आने-जाने में दिक्कत होने लगी।

हाईस्कूल में पहुंचने के बाद उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी। पिता घनश्याम देवांगन और मां उषा खेतों में काम कर परिवार चला रहे थे। इसलिए संसाधन की कमी का जिक्र भी नहीं कर सकते थे। फिर जैसे ही वह 10वीं में पहुंची सरस्वती साइकिल योजना के तहत सरकार ने उन्हें एक साइकिल दी। इससे स्कूल अाना-जाना आसान हो गया। पहले आने-जाने में ही काफी समय लग जाता था और ऊर्जा नष्ट होती थी। साइकिल मिलने के बाद पूरी ऊर्जा पढ़ाई में लगाने लगी। इसके चलते 10वीं में अच्छे अंक प्राप्त हुए।

खुद पढ़ने के बाद दुर्गेश्वरी अपने दादा-दारी को भी समय देती है। उनकी सेवा करती है और छोटे भाई खिलावन को भी पढ़ाई के लिए प्रेरित कर रही है, जो अभी 9वीं कक्षा में है। दुर्गेश्वरी का कहना है कि खिलावन को पढ़ाते समय उसको अपने टीचर होने का एहसास होता है और वह सोचती है कि इसी तरह वह गांव के बच्चों को पढ़ाएगी। उसका कहना है कि गांव में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन अच्छे शिक्षक के अभाव में उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिलता।

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